Bio-Technology

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''जैव प्रौद्योगिकी''
(प्रदेश में विकास का वरदान होगा जैव प्रौद्योगिकी का योगदान)
 
छत्तीसगढ़ का 44 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है।  इन जंगलों में अनेक बहुमूल्य वन उत्पाद, जड़ी-बूटियाँ तथा प्राकृतिक संसाधन विद्यमान है। राज्य शासन का लक्ष्य इन संसाधनों का प्रकृति को बिना नुकसान पहुँचाये दोहन करना है।  आधुनिक युग के प्रौद्योगिकियों का प्रयोग कर जैव विविधता के लाभ आम लोगों को पहुँचाने के प्रयास प्रदेश शासन द्वारा लगातार किया जा रहा है।  छत्तीसगढ़ इंफोटेक एवं बायोटेक प्रमोशन सोसायटी, चिप्स द्वारा जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में राज्य शासन की इसी मंशा की पूर्ति के लिए अनेक कार्य जैसे जैव प्रौद्योगिकी उद्यान की स्थापना का प्रयास, डी.एन.ए. डाटा बैंक स्थापना का प्रयास, मेडिकल कॉलेज में मेडिकल बायोटेक शाखा का संचालन आदि कार्य किये गये हैं। इसके अलावा, राजनांदगांव के वैद्य बैगा, गुनिया आदि के परम्परागत चिकित्सा पध्दति के ज्ञान एवं जड़ी बूटियों तथा औषधियों को लिपिबध्दकरण किया गया है। अनेक कार्यशालाओं का आयोजन निवेश प्रोत्साहन हेतु चिप्स द्वारा किया गया है।
 
जैव प्रौद्योगिकी के उद्देश्य :-
 
(1) प्रदेश के नागरिकों को जैव उत्पाद तथा जैव विज्ञान का अधिकतम लाभ उपलब्ध कराना।  
 
(2) जैव उत्पादों का उचित दोहन तथा सदुपयोग उनकी सुरक्षा की जानकारी आम नागरिकों तक पहुँचाना।
 
(3) जैव विविधता में अनुसंधान को प्रोत्साहित करना तथा इन अनुसंधानों का प्रयोग राज्य के हित में करना।
 
(4) प्रदेश के 60% से अधिक लोग आज भी गाँवों में निवास करते हैं। जहाँ उनके जिविकापार्जन का साधन कृषि तथा पशुपालन है। इन नागरिकों को नवीन प्रौद्योगिकी से अवगत कराते हुए उनके अनाज के उत्पादन को बढ़ाना, राज्य शासन के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
 
(5) उच्च गुणवत्ता की अधोसंरचान का विकास करना तथा जैव उद्योगों में निवेश को प्रोत्साहन देकर बढ़ाना।
 
 
जैव प्रौद्योगिकी एवं चिप्स
 
राज्य में जैव गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए चिप्स को नोडल एजेन्सी बनाया गया है।  इसके अन्तर्गत चिप्स निम्नांकित कार्य करेगा।
 
(1) बायोसेफ्टी, बायोइथिक्स, इन्टेलेक्चुअल प्रापर्टी राइट्स आदि विषयों पर कार्य करना।
(2) जैव उद्योगों में निवेश को सुनिश्चित करना।
(3) जैव उत्पादों के संभावित उपभोक्ताओं की खोज करना एवं पूंजी निवेशकों में जागरूकता पैदा करना।
(4) सुरक्षा मापदण्डों का पालन सुनिश्चित करना।
(5) मानव संसाधन का विकास करना।
(6) जैव-प्रौद्योगिकी उद्यान की स्थापना का कार्य प्रारंभ।
(7) शासन तथा निजी क्षेत्र को मानव संसाधन पर डेटाबेस उपलब्ध कराना।
(8) अनुसंधान के अकादमिक केन्द्रों से नेटवर्किंग की सुविधा प्रदान कराना।
(9) डी.एन.ए. डाटा बैंक की स्थापना।
 
जैव-प्रौद्योगिकी उद्यान की स्थापना :-
 
छत्तीसगढ़ वन तथा प्राकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण राज्य है।  यहाँ 44% भाग वनों से आच्छादित है और 60% से अधिक की जनसंख्या के जिविकोपार्जन का साधन कृषि तथा उस पर आधारित व्यवसाय है जैसे पशुपालन, मत्स्यपालन, वन उपज आदि है।  शासन का प्रयास है कि वह वैज्ञानिक विधियों से कृषि, मत्स्यपालन, पशुपालन को प्रोत्साहन देते हुए कृषि उपज, वन उपज को बढ़ाये तथा कृषकों के आर्थिक-सामाजिक प्रगति के प्रयास करे।  राज्य शासन ने जैव-प्रौद्योगिकी उद्यान के निर्माण प्रक्रिया प्रारंभ कर इस दिशा में कार्य प्रारंभ कर दिया है।  इस पार्क की स्थापना से राज्य में उपलब्ध जैव विविधताओं का व्यवसायिक दोहन हो सकेगा जिससे राज्य में रोजगार बढेंगे तथा व्यवसाय का विकास होगा।  इससे राज्य की आर्थिक सुदृढ़ता मिलेगी।  इस परियोजना के लिए निवेश को बढ़ावा देने के लिए चिप्स द्वारा बायोटेक इनवेस्टर मीट कराया गया। इस कार्यशाला में निवेशकों ने राज्य के जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश के लिए पर्याप्त रूचि दिखायी है।  राज्य में कृषि तथा वन क्षेत्र की प्रधानता के कारण इस योजना का महत्व बढ़ जाता है।  राज्य के 60% से अधिक लोगों पर इस योजना का प्रभाव पड़ेगा।  इस महत्वपूर्ण कारण को देखते हुए राज्य शासन ने जल्द से जल्द इस योजना को मूर्त रूप देने का निर्णय लिया है।
 
जैव-प्रौद्योगिकी एवं चिकित्सा : -
 
(1) राज्य के चिकित्सा महाविद्यालय में मेडिकल बॉयोटेक्नालॉजी में स्नात्कोत्तर पाठयक्रम प्रारंभ किया गया। यह देश का पांचवा केन्द्र है।
 
(2) मेडिकल कॉलेज रायपुर में अनुवांशिक रोगों के निदान के लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय स्मृति अनुसंधान संस्थान प्रारंभ किया गया।  इससे अभी तक 4500 से अधिक लोगों का इलाज किया जा चुका है।
 
जैव-प्रौद्योगिकी एवं कृषि : -
 
भारत सरकार द्वारा रू. 123.75 लाख की तीन परियोजनाओं को आगामी 5 वर्षों के लिए स्वीकृत किया गया, जो पूर्ण हो गया है। योजनाएं निम्नांकित हैं।
 
(1) धान की प्रजाति के पौष्टिक तत्वों का मूल्यांकन करना तथा उसकी पौष्टिकता में सुधार करना।
 
(2) जैव-प्रौद्योगिकी उत्पाद की संभावित उपभोक्ताओं एवं पूंजी निवेशकों में जागरूकता पैदा करना।
 
(3) धान के जड़ों की पारंपरिक किस्मों की अनुवांशिकता को मापना।
 
जैव-प्रौद्योगिकी एवं मानव संसाधन: -
 
(1) राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रायपुर में बॉयोइंफार्मेटिक्स हेतु सब डी.आई.सी. की स्थापना किया गया।
 
(2) विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन करना।
 
उपलब्धियाँ :-
 
(1) इंदिरा गांधी कृषि वि.वि. में DNA मार्कर्स पर प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन।
 
(2) राजनांदगांव के अम्बागढ़चौकी परिक्षेत्र में राज्य के वैद्य गुनिया, बैगाओं से परम्परागत चिकित्सा पध्दति के ज्ञान एवं जड़ी-बूटियों, औष्धियों के उपयोग को लिपिबध्द किया गया।
 
(3) इंदिरा गांधी कृषि वि.वि. में प्लांट जिनोमिक्स एवं बॉयोटेक विषय पर अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया।
 
(4) मानव विज्ञान विभाग पं. रविशंकर शुक्ल वि.वि. में 'कल्चरल एवं ह्यूमन जिनोम डायवर्सिटी' विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया।
 
(5) चिप्स के सहयोग से चिकित्सा महाविद्यालय में ''पं. दीनदयाल उपाध्याय रीजनल सेंटर फॉर जैनेटिक डिसीस एण्ड मोलीकूलर बॉयलाजी लैब'' की स्थापना की गयी है।
 
(6) मेडिकल कॉलेज रायपुर में चिप्स के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला में विभिन्न बीमारियों का परीक्षण, निदान एवं रोकथाम करने पर कार्ययोजना बनाई गई है।
 
(7) इन्वेस्टर मीट का आयोजन किया गया है।
 
(8) वर्ष 2005, 2006, 2007 एवं 2008 में बंगलोर बॉयो-फेयर में छत्तीसगढ़ को जैव-प्रौद्योगिकी में पुरस्कार तथा सम्मान प्राप्त हुआ है।